कोरबा। भारत सरकार ने देश भर में प्राचीन संपदा और विरासत को लोगों के सामने लाने के लिए पांडुलिपी सर्वेक्षण अभियान प्रारंभ किया है। पावर और एल्युमिनियम हब कोरबा जिले में यह सर्वेक्षण कई मायने में खास बन गया। जबकि यहां लोगों के पास से हजारों वर्ष पहले की पांडुलिपी मिली। ऐसा तब संभव हुआ जब कई पीढिय़ों ने उसे सहेज कर रखा।
कोरबा जिले में कल्चुरी राजाओं का शासन नवमी से लेकर ग्यारहवीं सदी में रहा। तुमान के शिव मंदिर से लेकर चैतुरगढ़ क्षेत्र की धरोहर उनके कालखंड की है। जबकि इसी कालखंड के आसपास विक्रमादित्य द्वितीय ने पाली में वास्तुकला के उदाहरण के तौर पर मंदिर का निर्माण कराया। पिछले दिनों सर्वेक्षण अभियान के अंतर्गत टीम को कई दुर्लभ दस्तावेज प्राप्त हुए। चूंकि यह ब्राह्मणी ओर देवनागरी लिपी में है इसलिए इनके अध्ययन की व्यवस्था नहीं हो सकी है। कोरबा के सीतामणी राम-जानकी मंदिर से भी इसी तरह की एक पांडुलिपी प्राप्त हुई। इसकी भाषा बिल्कुल उसी अंदाज में है जो कि गुफा मंदिर के द्वार पर लगे शिलालेख की है। खबर के अनुसार कई प्रकार के रहस्य ऐसे स्थानों को लेकर बताए जाते हैं। इसे सच इसलिए मान लिया जाता है क्योंकि भाषा के जानकार आसपास में नहीं हैं। आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया नागपुर कार्यालय को ऐसे मामलों की कापियां पहले भी भेजी गई है पर रिपोर्ट अप्राप्त है। कहा जा रहा है कि जब तक भाषाविद की व्यवस्था नहीं हो जाती, इतिहास की ये चीजें कुल मिलाकर रहस्य ही बनी रहेगी। जरूरत इस बात की है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर से इस दिशा में कोई विकल्प तय करे।
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Thursday, June 11
जिले का वैभव उजागर हो रहा पांडुलिपी सर्वेक्षण से
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