नईदिल्ली, १३ मई ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर संविधान के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान निर्माताओं ने समाज की जरूरतों को ध्यान में रखकर प्रविधान बनाए थे और नौ जजों की संविधान पीठ भी उस मूल संतुलन को नहीं बदल सकती।प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सुनवाई कर रही है। पीठ में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, आगस्टीन जार्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जोयमाल्या बागची भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल तत्वों को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण पहलू पूजा का अधिकार है और यह पवित्र स्थलों पर संपन्न होता है। यदि इसे बाधित किया जाता है तो श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन होगा।इस पर न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा, सामाजिक सुधार के नाम पर अनुच्छेद 25(1) के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार उनकी मासिक धर्म आयु है और मासिक धर्म को अब भी वर्जना के रूप में देखा जाता है। इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह नजरिये का सवाल है और महत्वपूर्ण यह है कि श्रद्धालु इसे किस रूप में देखते हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किसी मुद्दे पर सामाजिक सुधार की मांग करती है, तो अदालत उसे स्वीकार कर सकती है। लेकिन यदि लोगों की इच्छा के विरुद्ध कुछ थोपा जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि तर्कवादी लोग धर्म समेत हर चीज को तर्क की कसौटी पर परखते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51ए(एच) में वैज्ञानिक सोच और सुधारवादी दृष्टिकोण विकसित करने का दायित्व भी निहित है। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि संविधान ने धर्म के भीतर सुधार की परिकल्पना की है और अनुच्छेद 25 व 26 को बहिष्करण वाली प्रथाओं के पूर्ण संरक्षण के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और सभ्यता की निरंतरता को ध्यान में रखकर प्रविधान किए थे।मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
गौरतलब है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 बहुमत से सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था।सुप्रीम कोर्ट अवैध कोयला खनन और चोरी से संबद्ध मनी लांड्रिंग के मामले में एक निजी कंपनी के निदेशक अनुप माझी को मिली अग्रिम जमानत के विरुद्ध ईडी की याचिका की सुनवाई करने पर मंगलवार को राजी हो गया।जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कोयले की खरीद-बिक्री के कारोबार से जुड़ी कंपनी के निदेशक अनुप माझी को नोटिस जारी कर ईडी की याचिका पर जवाब मांगा है।ईडी ने मनी लांड्रिंग मामले में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा पिछले वर्ष जून में माझी को दी गई अग्रिम जमानत को चुनौती दी है। यह मामला 2020 में दर्ज किया गया था।ईडी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने अग्रिम जमानत रद करने का अनुरोध किया एवं दावा किया कि माझी 2,700 करोड़ रुपये के घो
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समाज सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं हो सकता, सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
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