नईदिल्ली, 0८ मई ।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को शामिल करने संबंधी उसका 2023 का फैसला केवल तब तक के लिए था, जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती। अदालत ने स्पष्ट किया कि उस फैसले में संसद को किसी विशेष ढांचे में कानून बनाने का निर्देश नहीं दिया गया था। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। विवाद का मुख्य मुद्दा चयन समिति से सीजेआई को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल करना है। मामले की अगली सुनवाई 14 मई को होगी।सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता जया ठाकुर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता जितनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने दलील दी कि न्यायिक नियुक्तियों में अपनाए जाने वाले सिद्धांत चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर भी लागू होने चाहिए।पीठ ने टिप्पणी की कि वर्षों तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून नहीं बनाना निर्वाचितों की तानाशाही जैसा था। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले ने केवल संवैधानिक शून्य को भरा था। एडीआर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सभी सरकारों ने लंबे समय तक कानून न होने का फायदा उठाया और नियुक्तियों में मनमानी की गुंजाइश बनी रही। याचिकाओं में कहा गया है कि नए कानून में सीजेआई को चयन समिति से बाहर करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक भावना के खिलाफ है।
मौजूदा चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सीजेआई को हटाने से नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव बढ़ गया है और प्रधानमंत्री तथा उनके नामित मंत्री की भूमिका निर्णायक हो जाती है। सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि 2023 का यह कानून संसद में लगभग बिना बहस के ध्वनि मत से पारित किया गया था। वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने बताया कि उस समय लोकसभा के 95 और राज्यसभा के 12 विपक्षी सांसद निलंबित थे। भूषण ने कहा कि एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने विधेयक का विरोध करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल फैसले के खिलाफ बताया था, लेकिन सरकार ने विस्तृत बहस के बजाय इसे ध्वनि मत से पारित करा लिया।
Wednesday, May 20
सीईसी नियुक्ति में सीजेआई को शामिल करना कानून बनने तक ही था, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
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