बिलासपुर | छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए सभी आरोपियों की दोषमुक्ति बरकरार रखी है. कोर्ट ने दंतेवाड़ा की निचली अदालत के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें 2013 में सबूतों के अभाव में आरोपियों को बरी कर दिया गया था.
करीब 16 साल पुराने इस मामले में 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला जंगल में हुए नक्सली हमले में CRPF के 75 जवान और राज्य पुलिस का एक जवान शहीद हुआ था. इसे देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में गिना जाता है.
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अपने 5 मई 2026 के फैसले में कहा कि इतने बड़े नरसंहार के बावजूद जांच एजेंसियां असली आरोपियों के खिलाफ अदालत में विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह विफल रहीं. कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा- “यह बेहद पीड़ादायक है कि CRPF के 75 जवानों और राज्य पुलिस के एक सदस्य की शहादत के बावजूद, अभियोजन एजेंसियां इस बर्बर अपराध के असली दोषियों की पहचान करने और उन्हें न्याय के कटघरे तक लाने में सफल नहीं हो सकीं.”
डिवीजन बेंच ने आगे कहा- “हम यह देखकर और भी दुखी हैं कि इतने बड़े पैमाने पर जनहानि और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर असर डालने वाले मामले में आरोपियों के खिलाफ कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य और भरोसेमंद साक्ष्य पेश नहीं किया जा सका. परिणामस्वरूप ट्रायल कोर्ट को उन्हें बरी करने के लिए विवश होना पड़ा.”
अदालत भावनाओं नहीं, साक्ष्यों पर चलती है
कोर्ट ने कहा- “अपराध की भयावहता और जान-माल की बड़ी क्षति के बावजूद न्याय व्यवस्था को कानून के शासन और साक्ष्यों के तय मानकों का सख्ती से पालन करना होगा.” अदालत ने आगे कहा- “सिर्फ मजबूत शक, अपने आप में, संदेह से परे अपराध सिद्ध करने का विकल्प नहीं हो सकता.” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष पर आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी होती है और यदि साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी नहीं हो, तो आरोपी को संदेह का लाभ देना कानून का मूल सिद्धांत है.
अभियोजन की कहानी कोर्ट में क्यों ढह गई
राज्य की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने घायल CRPF जवानों की गवाही नहीं लेकर गंभीर गलती की. लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि कथित इकबालिया बयान किसी स्वतंत्र साक्ष्य से समर्थित नहीं था. अदालत ने यह भी नोट किया कि अधिकांश गवाह hostile हो गए थे और किसी भी प्रत्यक्षदर्शी ने आरोपियों की पहचान नहीं की. फैसले में कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित ही नहीं कर पाया कि आरोपियों ने मिलकर पुलिस पार्टी पर हमला करने की साजिश रची थी या घटनास्थल पर विस्फोटक लगाए थे.
हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों की कई बड़ी चूकों को विस्तार से गिनाया. अदालत ने कहा-
- किसी भी प्रत्यक्षदर्शी ने आरोपियों की पहचान नहीं की.
- आरोपियों की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई.
- घटनास्थल से जब्त विस्फोटकों की एफएसएल रिपोर्ट अदालत में पेश नहीं की गई.
- जब्त हथियार और विस्फोटक आरोपियों के कब्जे से नहीं मिले.
- Arms Act के तहत जरूरी अभियोजन स्वीकृति रिकॉर्ड पर नहीं थी.
- जांच में फोरेंसिक और तकनीकी साक्ष्यों का गंभीर अभाव रहा.
- परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला साबित नहीं हो सकी. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को वैज्ञानिक और कानूनी दोनों स्तर पर बेहद सतर्क रहना चाहिए था, लेकिन यहां जांच में गंभीर प्रक्रियागत खामियां रहीं.
जांच में लापरवाही से न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है
डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को भविष्य के लिए सख्त चेतावनी भी दी. अदालत ने कहा- “राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में गंभीर अपराधों की जांच उच्च मानकों के साथ की जाए, ताकि प्रक्रियागत चूकों के कारण आरोपी बच न सकें और न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा बना रहे.”कोर्ट ने आगे कहा कि जांच एजेंसियों को फोरेंसिक, बैलिस्टिक और तकनीकी साक्ष्य समय पर जुटाने होंगे, जब्त सामग्री की chain of custody सुरक्षित रखनी होगी और गवाहों की पहचान व TIP जैसी कानूनी प्रक्रियाएं तत्काल पूरी करनी होंगी. हाईकोर्ट ने मामले की प्रमाणित प्रति राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भेजने का निर्देश भी दिया, ताकि भविष्य में ऐसी जांच संबंधी खामियां दोहराई न जाएं.

