कोलकाता। बंगाल की राजनीति ने 2026 में एक ऐसा मोड़ लिया है, जिसने पिछले करीब पांच दशकों की स्थापित परंपरा को तोड़ दिया। यह पहला अवसर है जब किसी गैर-गठबंधन दल ने सीधे सत्तारूढ़ पार्टी को सत्ता से बेदखल किया है। अब तक बंगाल की सत्ता परिवर्तन की कहानी गठबंधनों के ईद-गिर्द ही घूमती रही थी, चाहे कांग्रेस को हटाने के लिए वाममोर्चा का उदय हुआ हो या 2011 में ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस और एसयूसीआइ के साथ मिलकर 34 साल पुराने वाम शासन का अंत।
बंगाल के संसदीय इतिहास में यह पहली बार ये बदलाव
बंगाल के संसदीय इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब किसी राजनीतिक दल ने बिना किसी औपचारिक बैसाखी या गठबंधन के सत्तारूढ़ दल को सत्ता के सिंहासन से बेदखल किया है।
यह जीत केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की उस ‘गठबंधन संस्कृति’ का अंत है, जिसने आधी सदी से भी अधिक समय तक यहां की राजनीति को नियंत्रित किया था।
गठबंधन के बोझ से मुक्त हुआ लोकतंत्र यदि इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि बंगाल में सत्ता का हस्तांतरण हमेशा रणनीतिक गठजोड़ का मोहताज रहा है। 1977 में जब कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग को ढहाया गया, तो वह माकपा के नेतृत्व वाले वाममोर्चा का सामूहिक प्रहार था।
इसके बाद 34 वर्षों तक चले वामपंथी शासन को उखाड़ने के लिए 2011 में ममता बनर्जी को भी कांग्रेस और एसयूसीआइ जैसे वाम दलों का हाथ थामना पड़ा था। ममता की परिवर्तन की लहर में भी गठबंधन की विवशता शामिल थी।
लेकिन 2026 के इन चुनाव परिणामों ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है। भाजपा ने महज एक सीट पर स्थानीय प्रभाव वाले चेहरे को जगह देकर शेष 293 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ा और तृणमूल कांग्रेस के अपराजेय माने जाने वाले किले को ढहा दिया।
ध्रुवीकरण और ‘सबका साथ’ का नया रसायन
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा की इस अप्रत्याशित सफलता के पीछे ‘एकला चलो रे’ की वह रणनीति रही, जिसने मतदाताओं के सामने एक स्पष्ट विकल्प रखा। जहां विपक्षी खेमे अक्सर वैचारिक अंतर्विरोधों वाले गठबंधनों में उलझ जाते थे, वहीं भाजपा ने सीधे जनता से संवाद साधा।
बंगाल की इस ऐतिहासिक जीत ने यह सिद्ध कर दिया है कि राज्य का मतदाता अब ‘खिचड़ी सरकारों’ के बजाय पूर्ण बहुमत और स्पष्ट विचारधारा वाली शक्ति को प्राथमिकता दे रहा है।

