सीताराम नायक
जांजगीर चांपा। जिले में ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में मजदूरों की स्थिति में सुधार देखने को नहीं मिल रहा है मजदूरों के नाम से बड़ी-बड़ी बातें करने वाले राजनेता अब उन संस्थाओं के गुलाम होते जा रहे हैं जिन संस्थाओं द्वारा मजदूरों का शोषण लगातार हो रहा है। उन्हें हक दिलाने के नाम पर तमाम नेता अपनी जेब भरने से गुरेज नहीं करते। यही कारण है कि सत्ता से डरे बगैर उद्योग प्रबंधनों द्वारा मजदूरों का खुलेआम शोषण किया जा रहा है। मजदूर वर्ग हर जगह शोषण के शिकार हो रहे हैं जहां उन्हें काम के बदले सही दाम नहीं मिल रहा है तो वही सुरक्षा संसाधनों के अभाव में वे कार्य करने को मजबूर है नतीजा यह है कि समय-समय पर सुरक्षा संसाधनों में कमी के कारण मजदूर अपनी जान गवां बैठते हैं।
विगत दिनो सक्ती जिले के सिंघीतराई में एथेना पावर प्लांट में 24 मजदूरों की जान चली गई यह कोई पहली घटना नहीं है बल्कि आरकेएम,जेएसडब्ल्यू, लाफार्ज, प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड,श्याम एग्रो पावर यहां तक की मड़वा पावर प्लांट में भी कार्यरत मजदूरों को पर्याप्त सुरक्षा के साधन उपलब्ध नहीं कराए जाते जिसका खामियाजा समय-समय पर मजदूरों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। मजदूरों की हित एवं उनके सुरक्षा की चर्चा तो आए दिन होती परंतु इस पर ईमानदारी से कार्य कोई नहीं करता। मजदूरों की सुरक्षा एवं उनके हक की बात की जाए तो उद्योग प्रबंधन एवं मजदूर संगठनों तथा सरकार की ओर टक टकी लगाए सभी देखते हैं।
ज किंतु इन तीनों के द्वारा समय-समय पर मजदूरों के हक पर जहां डाका डाला जाता है वहीं श्रमिक संगठन एवं कारखाना प्रबंधन पीठ दिखाने में पीछे नहीं रहती। रहा सवाल सरकार की तो वह भी उद्योग प्रबंधन के हितों को ध्यान में रखते हुए उनके हितों की बातें अधिक करती है और दिखावे के लिए मजदूरों के हित में खड़े होने का दंभ भरती है। ऐसे में यह निर्णय किसी जख्मी के जख्म पर एक मलहम का कार्य तो करती है किंतु उन्हें दिल और दिमाग से तथा आर्थिक दृष्टि से मजबूत नहीं करती इसी कारण अब जांजगीर चांपा जिला ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ में कार्यरत मजदूर सत्ता में बैठे राजनेताओं के बजाय भगवान पर अधिक भरोसा रखते हैं। क्योंकि मजदूर वर्ग को जनप्रतिनिधि एवं सरकार द्वारा समय-समय पर शिवाय धोखा के कुछ नहीं मिलता।
विभिन्न कारखाना प्रबंधनों के अधीन कार्यरत कर्मचारी संगठनों द्वारा कर्मचारी एवं उनके परिवार के हितों को लेकर भी बड़ी-बड़ी बातें की जाती है किंतु कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी भी उद्योग प्रबंधन के चापलूसी में उत्तर आते हैं जो मजदूरों के बहाने श्रमिक संगठन के लोग खुद के स्वार्थ साधने लगे हैं ऐसे में मजदूरों की हालत में कोई सुधार तो नहीं दिखता लेकिन श्रमिक संगठन के पदाधिकारी के जीवन में बदलाव जरूर नजर आता है। जो कारखाना प्रबंधन से चापलूसी करके स्वहित साधते रहते हैं। यह मामला किसी एक कारखाने की नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ में संचालित प्रत्येक उद्योग, कारखाने में देखी जा सकती है जहां कल तक मोटरसाइकिल में घूमने वाले कर्मचारी नेता कुछ समय में ही चार पहिया में घूमते हुए देखे जा सकते हैं । जांजगीर चांपा, सक्ती जिला भी इससे अछूता नहीं है इस जिले में संचालित कारखाने में श्रमिक संगठनों की स्थिति सबसे भयावह है यहां श्रमिकों के नाम पर संचालित संगठनों के प्रमुख पदाधिकारी एक तरह से उद्योग प्रबंधन के गुलाम हो गए हैं। जब संगठन प्रमुखों की हालत ही ऐसी है तो यहां कार्यरत मजदूरों की दशा क्या होगी सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। बहरहाल मजदूर दिवस एक औपचारिकता बनकर रह गई है जहां इस दिवस को लेकर सत्तापक्ष भाजपा चुप्पी साधे हुई है तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी के नेता बोरे-बासी खाकर औपचारिकता निभा रहे हैं। हालात मजदूरों की आज भी जस के तस बनी हुई है। जिसे सुधारने वाला कोई नहीं है।
Wednesday, May 20
उद्योग प्रबंधनों द्वारा मजदूरों का किया जा रहा अनवरत शोषण, जिम्मेदार मौन
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